Monday, December 9, 2013

एक थी शीला---एक राजनीतिक व्यंग्य (हास्य कविता)

बात नहीं पुरानी
एक थी शीला और शीला की जवानी 
बनती थी  बड़ी सयानी  
एक थी शीला और शीला की जवानी 

कॉर्पोरेट हाउस से पैसे खाये  . . . बदले में बिजली के बिल बढ़वाये 
जनता न हो कभी रिलैक्स , इसलिए बढ़ाया पानी पे टैक्स 
लोगो के दर्द-ए -ग़म  से 
हरदम रही बेगानी 

बात नहीं पुरानी
एक थी शीला और शीला की जवानी 

दिल्ली  में एक खेल हुआ 
पैसो का धुरखेल हुआ 
परदेसी  खिलाडी आये… 
अपने अपने खेल दिखाए 
एक  करतब शीला का भी था
कालमाड़ी  संग रास-लीला का था 
अरबो खरबो कि चपत लगी 
लेकिन जनता को  भनक  लगी  
जनता बौराई गुस्साइ 
सड़को पे उतर आयी 
शीला ने उनकी भी न सुनी 
और कि अपनी मनमानी 

बात नहीं पुरानी
एक थी शीला और शीला की जवानी 

शीला को समझाने को 
सही रास्ते पे लाने को एक दीवाना आया 
साथ में जनशक्ति लाया 
नाम था अरविंद  केजरीवाल 
थे दृढ इरादे  चौड़ी थी भाल 
कुछ कर लेने कि थी अरविन्द ने ठानी  

बात नहीं पुरानी
एक थी शीला और शीला की जवानी 

जब नाश मनुष्य पे छाता है 
पहले विवेक मर जाता है 

शीला का भी था यही हाल 
अरविन्द का कर दिया अपमान 

फिर एक दिन 

हैरान परेशान था आदमी 
तभी आयी एक उम्मीद 
पार्टी आम आदमी 
हर जगह थी झूठ और मक्कारी कि फसल 
जनता थी परेशान 
के कौन है उनका तारण हार असल 

बजा चुनावी बिगुल 
शीला गई शालीनता भूल 
अरविन्द को नाचीज़ कहा 
दिल्ली है मेरी चीज़  कहा 

आगे बढ़ चली कहानी 

बात नहीं पुरानी
एक थी शीला और शीला की जवानी 

फिर चुनावी जंग छिड़ी  
सारी  पार्टियां  भिड़ी 
शीला अरविन्द दो दो हाथ हुए 
कुछ बिखरे लोग भी साथ हुए 
जंग  का नतीज़ा  आया 
आम आदमी के झाड़ू का परचम  लहराया 
शीला हारी
हुई शर्म से लाल 
उसको अपने बड़बोले  का था मलाल 

शीला अब ना रही दिल्ली कि रानी 

बात नहीं पुरानी
एक थी शीला और शीला की जवानी 


And Sheila Now...

Sheila…And no more uski jawani..
She is too old for you…Sheila hui purani…
Baat nahi puraani….
Ek thi sheila aur sheila ki jawaani….


मेरी अपनी रचना (अभिषेक कुमार तिवारी)

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